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लेख के मुख्य अंश:
- आम नागरिकों के लिए न्याय प्रक्रिया का लंबा होना एक गंभीर चिंता का विषय।
- वरिष्ठ नागरिकों और पेंशनभोगियों के मामलों में लगातार मिल रही हैं ‘तारीखें’।
- सर्वोच्च न्यायालय के 2009 के ‘सत्यपाल सिंह’ फैसले की प्रासंगिकता पर चर्चा।
- ‘एम सी सिंगला केस’ में लाखों बैंक पेंशनर्स वर्षों से कर रहे हैं न्याय की प्रतीक्षा।
- सरकारी क्षेत्र के विपरीत, बैंकिंग क्षेत्र में पेंशन संशोधन का न होना बड़ा भेदभाव।
पेंशनर्स की सांसें अटकीं, पर तारीखों का दौर जारी
बीकानेर। देश की न्याय प्रणाली पर सवाल उठाना स्वाभाविक है जब कुछ चुनिंदा मामलों के लिए आधी रात को अदालतें खुल सकती हैं, लेकिन लाखों बुजुर्ग पेंशनभोगियों के भविष्य से जुड़े मामलों को तारीखों के जाल में उलझा दिया जाता है। ग़ौरतलब है कि सेवानिवृत्त बैंकर्स का ‘एम सी सिंगला केस’ इसका ज्वलंत उदाहरण है। इन पेंशनर्स की उम्र 70 से 80 वर्ष के बीच है, जहाँ समय का हर एक पल कीमती है। कई पेंशनर्स न्याय का चेहरा देखे बिना ही इस दुनिया से विदा हो गए हैं, लेकिन अदालत में सुनवाई मुकम्मल नहीं हो पा रही है।
तफ्तीश: बैंकिंग सेक्टर में पेंशन का ‘अन्याय’
ऑल इंडिया रिटायर्ड बैंक एम्पलाईज एसोसियेशन के राजस्थान महासचिव आर.के. शर्मा के अनुसार, बैंकिंग सेक्टर देश का इकलौता ऐसा क्षेत्र है जहाँ आज तक पेंशन संशोधन (Pension Revision) नहीं हुआ है। विडंबना यह है कि एक पूर्व महाप्रबन्धक (GM) की पेंशन आज के रिटायर होने वाले अधिकारी से काफी कम है। जहाँ केंद्र और राज्य सरकारों में हर वेतन आयोग के साथ पेंशन बढ़ती है, वहीं बैंक पेंशनर्स उसी मूल पेंशन पर गुजारा करने को मजबूर हैं जो दशकों पहले तय हुई थी।
न्याय की इस तफ्तीश में यह कड़वी हकीकत सामने आई है कि 7 मई को होने वाली सुनवाई एक बार फिर अधूरी रही और 13 मई की नई तारीख थमा दी गई। सेवानिवृत्त बैंकर्स की आँखों में उम्मीद अब धीरे-धीरे निराशा में तब्दील हो रही है। यदि न्याय समय पर नहीं मिला, तो इसे न्याय कहना भी मुश्किल होगा। अब सारा दारोमदार देश की सर्वोच्च अदालत पर है कि वह इन बुजुर्गों की आर्थिक और शारीरिक पीड़ा को समझते हुए त्वरित फैसला सुनाए।
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