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📍 राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर
🔨 ऐतिहासिक फैसला
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📌 फैसले के मुख्य बिंदु
- ▶ न्यायाधीश फरजन्द अली की एकलपीठ ने दर्जनों याचिकाओं का निस्तारण करते हुए सुनाया यह ऐतिहासिक फैसला
- ▶ असंवैधानिक करार: खाप या जाति पंचायतों को कानूनी रूप से कोई अधिकार नहीं, वे समानांतर न्याय व्यवस्था नहीं चला सकतीं
- ▶ मौलिक अधिकारों का हनन: ‘हुक्का-पानी बंद’ (सामाजिक बहिष्कार) करना नागरिकों के संविधान प्रदत्त अधिकारों पर सीधा और क्रूर हमला है
- ▶ सख्त पुलिस कार्रवाई: बहिष्कार या जुर्माने की धमकी देने वालों पर तुरंत मुकदमा दर्ज कर नब्बे दिनों के भीतर जांच पूरी की जाए
- ▶ नया कानून बनेगा: अदालत ने राज्य सरकार को महाराष्ट्र की तर्ज पर ‘सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम’ बनाने का निर्देश दिया है
जोधपुर। राजस्थान के कई जिलों में आज भी पुरानी रूढ़िवादी सोच और जातिगत पंचायतों का खौफ कायम है। लोगों को समाज से बेदखल करने, मनमाना जुर्माना थोपने और ‘हुक्का-पानी बंद’ करने जैसी कुप्रथाओं पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक हथौड़ा चलाया है। अदालत ने साफ शब्दों में कह दिया है कि देश में कानून का शासन है और कोई भी खाप पंचायत ‘समानांतर अदालत’ बनकर अपनी मनमानी नहीं चला सकती।
यह मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला न्यायाधीश फरजन्द अली की एकलपीठ ने शुक्रवार को सुनाया। अदालत ने सिरोही, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, जालौर और ब्यावर जिलों से जुड़ी एक दर्जन से अधिक याचिकाओं की सुनवाई करते हुए यह कड़ा आदेश जारी किया है। इन सभी मामलों में पीड़ितों ने खाप पंचायतों द्वारा अमानवीय उत्पीड़न, जबरन आर्थिक दंड और सामाजिक अलगाव के गंभीर आरोप लगाए थे।
🛑 ‘हुक्का-पानी बंद’ सबसे क्रूर उत्पीड़न
अदालत ने अपने फैसले में ‘हुक्का-पानी बंद’ की कुप्रथा को बेहद खतरनाक और सामाजिक उत्पीड़न का सबसे क्रूर रूप बताया है।
न्यायाधीश ने कहा— “किसी व्यक्ति को समाज से पूरी तरह काट देना, उसके साथ रोज़मर्रा के लेन-देन और व्यापार बंद कर देना, संविधान के अनुच्छेद चौदह, पंद्रह, उन्नीस और इक्कीस का सीधा उल्लंघन है। यह केवल एक बहिष्कार नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के सम्मान (गरिमा) और उसके मानसिक, आर्थिक व सामाजिक जीवन पर बहुत गहरा प्रहार है।”
जबरन वसूली और बिना सुनवाई के फैसले
अदालत के सामने कई ऐसे चौंकाने वाले मामले आए, जिनमें खाप पंचायतों ने बिना किसी कानूनी अधिकार के लोगों पर लाखों रुपये का जुर्माना थोप दिया था। एक मामले में तो पीड़ित को अपनी पत्नी के निधन के बाद महंगे धार्मिक कार्यक्रम करने के लिए मजबूर किया गया, जिसमें उसे करीब साढ़े तीन लाख रुपये खर्च करने पड़े। इसके बावजूद पंचायत ने उस गरीब व्यक्ति से पांच लाख रुपये की अतिरिक्त मांग कर डाली।
हाईकोर्ट ने कहा कि ये तथाकथित पंचायतें स्वयं को एक ‘न्यायिक प्राधिकरण’ के रूप में पेश कर रही हैं, जबकि इनके पास रत्ती भर भी वैधानिक अधिकार नहीं है। इनके द्वारा सुनाए गए फैसले पूरी तरह से दबाव, डर और बिना किसी प्राकृतिक न्याय (सुनवाई के बिना) के होते हैं, जो बिल्कुल अस्वीकार्य हैं। विवाह करना या न करना, अपनी जीवनशैली चुनना और सामाजिक संबंध रखना हर नागरिक का व्यक्तिगत और निजी अधिकार है।
“हाईकोर्ट द्वारा गठित एक पांच सदस्यीय विशेष आयोग ने पाली, बांसवाड़ा, जालोर और जैसलमेर का दौरा कर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट ने भी खाप पंचायतों की पोल खोलते हुए बताया कि ‘हुक्का-पानी बंद’ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, ताकि पीड़ित को मानसिक रूप से तोड़ा जा सके।”
पुलिस प्रशासन और सरकार को कड़े आदेश
उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और पुलिस महानिदेशक को इस कुप्रथा को जड़ से उखाड़ने के लिए कई बेहद सख्त और महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं:
- सामाजिक बहिष्कार, जबरन वसूली या धमकी के मामलों में तुरंत मुकदमा दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए।
- ऐसे मामलों की जांच नब्बे दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए।
- इन गंभीर मामलों की जांच एक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एडिशनल एसपी) स्तर का अधिकारी करेगा।
- राज्य के हर जिले में एक ‘नोडल अधिकारी’ नियुक्त किया जाएगा, जो कलेक्टर और एसपी के समन्वय से इन मामलों की मॉनिटरिंग करेगा।
- जिन पीड़ितों की जान को खतरा है, उन्हें तत्काल पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाए।
महाराष्ट्र की तर्ज पर बनेगा नया कानून, ‘नाता प्रथा’ पर भी चिंता
न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि राजस्थान में वर्तमान में सामाजिक बहिष्कार रोकने के लिए कोई विशेष और कड़ा कानून मौजूद नहीं है। इसलिए अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह महाराष्ट्र के ‘सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम’ की तर्ज पर राजस्थान में भी जल्द से जल्द एक नया और प्रभावी कानून बनाए।
इसके अलावा, अदालत ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित ‘नाता प्रथा’ पर भी गहरी चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह प्रथा महिलाओं को केवल एक ‘वस्तु’ (सामान) की तरह देखने की संकीर्ण मानसिकता को बढ़ावा देती है और उनके मूल अधिकारों का हनन करती है। अदालत ने इस कुप्रथा पर भी सामाजिक और कानूनी स्तर पर गंभीर विचार करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
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