बीकानेर: प्रोफ़ेसर मोहम्मद हुसैन के सम्मान में सजी ‘शे’री नशिस्त’; उर्दू अदब की खुशबू से महका नज़ीर ग़ौरी सभागार, जुटे दिग्गज शायर

📜 साहित्य एवं संस्कृति | बीकानेर | शे’री नशिस्त

बीकानेर की समृद्ध साहित्यिक परंपरा में उर्दू अदब का योगदान हमेशा से बेमिसाल रहा है। डॉ. मोहम्मद हुसैन के सम्मान में आयोजित विशेष नशिस्त में शायरों ने अपनी ताज़ा गज़लों और तरन्नुम से न केवल समां बांधा, बल्कि आधुनिक उर्दू शायरी में नवाचार की एक नई मिसाल पेश की।

📰 ख़बर बीकानेर | 📅 24 मई, 2026 | 📍 नज़ीर ग़ौरी सभागार, बीकानेर | 👤 स्रोत: क़ासिम बीकानेरी



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नशिस्त की मुख्य विशेषताएं:

  • प्रसिद्ध उर्दू शायर और समालोचक प्रो. मोहम्मद हुसैन का हुआ भव्य सम्मान।
  • वरिष्ठ कवि कमल रंगा की अध्यक्षता में गूंजी राजस्थानी और उर्दू की जुगलबंदी।
  • शायर क़ासिम बीकानेरी, राजेंद्र स्वर्णकार और वली मोहम्मद गौरी के कलामों की धूम।
  • इरशाद अज़ीज़ और रवि शुक्ला के तरन्नुम ने श्रोताओं को किया मंत्रमुग्ध।
  • युवा शायरों मोइनुद्दीन और माजिद खान ने सामयिक हालात पर पेश किए उम्दा शेर।

साहित्यिक परंपरा और उर्दू का गौरव

बीकानेर। ‘बीकानेर साहित्य संस्कृति कला संगम’ की ओर से नज़ीर ग़ौरी सभागार में आयोजित ‘शे’री नशिस्त’ बीकानेर के साहित्यिक इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गई। ग़ौरतलब है कि इस महफ़िल की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि व कथाकार कमल रंगा ने कहा कि बीकानेर की धरा हमेशा से ही उर्दू अदब की उर्वर भूमि रही है। उन्होंने राजस्थानी कविता की मार्मिक पंक्तियों ‘सुपनां रै रंगां राच्योड़ी…’ के माध्यम से भाषाई सीमाओं को तोड़ते हुए श्रोताओं की भरपूर दाद बटोरी। कला संगम के संस्थापक अध्यक्ष शायर क़ासिम बीकानेरी ने इस आयोजन को प्रो. मोहम्मद हुसैन के साहित्यिक योगदान को समर्पित बताया।

“फ़िक्र में रंग भरे लहजे से ख़ुशबू आए,
मीर-ओ-ग़ालिब की तरह हमको जो उर्दू आए।”
– प्रो. मोहम्मद हुसैन

शायरी की महक और लफ़्ज़ों की जुगलबंदी

मुख्य अतिथि प्रो. मोहम्मद हुसैन ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में ग़ज़लें पेश कर समां बांध दिया। उनके शेर ‘मुश्को-अंबर से फ़ुज़ुं लफ़्ज़ों से ख़ुशबू आए…’ को श्रोताओं ने बेहद सराहा। तफ्तीश और काव्य चर्चा के दौरान शायर क़ासिम बीकानेरी का शेर ‘खत में कोई गुलाब आने दो’ और वली मोहम्मद ग़ौरी का शेर ‘जो सफ़र में हम-सफ़र है वो जुदा हो जाएगा’ महफ़िल की जान बने रहे। सूत्रों के अनुसार, वरिष्ठ ग़ज़लकार राजेंद्र स्वर्णकार और इरशाद अज़ीज़ ने अपनी ग़ज़लों को तरन्नुम (लय) में पेश कर श्रोताओं के दिलों में गहरी पैठ बनाई।

महफ़िल में रवि शुक्ला (रे शीन), प्रमोद कुमार शर्मा, मोइनुद्दीन ‘मुईन’ और माजिद खान जैसे शायरों ने भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। माजिद खान ने ‘हवाओं में सियासत हो रही है’ के माध्यम से समकालीन सामाजिक परिवेश पर तीखा प्रहार किया। कार्यक्रम का आगाज़ हाफ़िज़ ज़िया मोहम्मद बीकानेरी ने तिलावते पाक से किया, जबकि मुफ्ती अशफ़ाक़ ग़ौरी रज़वी ने मेहमानों का इस्तकबाल किया। इस यादगार शाम का समापन वली मोहम्मद ग़ौरी के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।



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