बीकानेर/नई दिल्ली: मनरेगा मज़दूरों के लिए बड़ी राहत: आधार बेस्ड पेमेंट सिस्टम (ABPS) को वैकल्पिक बनाने की सिफारिश, संसदीय समिति ने सरकार को दिया अहम सुझाव!

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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) के तहत काम करने वाले लाखों मज़दूरों को जल्द ही बड़ी राहत मिल सकती है। ग्रामीण विकास पर बनी संसदीय स्थायी समिति ने सरकार से सिफारिश की है कि मजदूरी भुगतान के लिए ‘आधार-आधारित पेमेंट सिस्टम’ (ABPS) को अनिवार्य न बनाकर ‘वैकल्पिक’ (Optional) रखा जाए।

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📌 खबर के मुख्य बिंदु

  • संसदीय स्थायी समिति ने मनरेगा (MGNREGS) मज़दूरी भुगतान के लिए अपनी नई रिपोर्ट सौंपी
  • सिफारिश: आधार-आधारित पेमेंट सिस्टम (ABPS) को पूरी तरह से ‘वैकल्पिक’ (Optional) बनाया जाए
  • मज़दूरों को NACH (National Automated Clearing House) और अन्य आसान विकल्प मुहैया कराए जाएं
  • समस्या: ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जनवरी 2024 से इस (ABPS) सिस्टम को कर दिया था अनिवार्य
  • लाभ: दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले बुज़ुर्ग मज़दूरों को बायोमेट्रिक फेल होने की समस्या से निजात मिलेगी

नई दिल्ली। देश के करोड़ों दिहाड़ी मज़दूरों की जीवनरेखा मानी जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) के नियमों में एक बड़ा और अहम बदलाव हो सकता है। ग्रामीण विकास और पंचायती राज पर बनी संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) ने शुक्रवार को सरकार को अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है, जो दूरदराज के गांवों में रहने वाले मज़दूरों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

🛑 संसदीय समिति की क्या है सिफारिश?

संसदीय समिति ने ग्रामीण विकास मंत्रालय (Ministry of Rural Development) से मज़बूती के साथ यह सिफारिश की है कि मजदूरी (फंड) ट्रांसफर करने के लिए ‘आधार-आधारित पेमेंट सिस्टम’ (ABPS) को पूरी तरह से अनिवार्य न किया जाए, बल्कि इसे वैकल्पिक (Optional) बनाया जाए।

समिति का मानना है कि बुज़ुर्ग मज़दूरों और अत्यंत दूरदराज के (पहाड़ी/जंगली) इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह सिस्टम मुसीबत बन रहा है। वहां नेटवर्क और बायोमेट्रिक फेल (Biometric Failure) होने के कारण कई मज़दूर अपनी ही मेहनत की कमाई से वंचित रह जाते हैं।

जनवरी 2024 से अनिवार्य हुआ था ABPS

ग़ौरतलब है कि केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इसी साल जनवरी 2024 से मनरेगा (MGNREGS) के तहत मजदूरी भुगतान के लिए ‘आधार-बेस्ड सिस्टम’ को पूरी तरह से अनिवार्य (Mandatory) कर दिया था।

मंत्रालय ने इस बड़े कदम के पीछे तर्क दिया था कि आधार लिंकिंग से योजना में होने वाली लीकेज (भ्रष्टाचार और फर्जी जॉब कार्ड) को रोकने में मदद मिलती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सरकार का पैसा बिना किसी बिचौलिए के सीधे ‘असली’ लाभार्थी (Beneficiary) के बैंक खाते (DBT) में ही जा रहा है।

पहले कैसे मिलता था पैसा? (NACH प्रणाली)

आधार सिस्टम के लागू होने से पहले, मनरेगा मज़दूरों का भुगतान नेशनल ऑटोमेटेड क्लियरिंग हाउस (NACH) के ज़रिए इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट (Electronic Payment) के रूप में सीधा उनके साधारण बैंक खातों में किया जाता था। इस पुरानी प्रणाली में आधार बायोमेट्रिक या नेटवर्क लिंकिंग की कोई विशेष बाध्यता नहीं थी, जिससे पैसा आसानी से मिल जाता था।

“अब संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि सरकार को NACH या ऐसे ही किसी ‘अन्य आसान विकल्प’ (Alternative Easy Process) पर जाने की प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिए। मज़दूर को यह चुनने की आज़ादी होनी चाहिए कि वह ‘आधार’ के ज़रिए पेमेंट लेना चाहता है या ‘साधारण बैंक ट्रांसफर’ के ज़रिए।”

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केंद्र सरकार इस संसदीय समिति की सिफारिशों को मान लेती है, तो यह देश के करोड़ों ग्रामीण मज़दूरों के लिए एक बड़ी वित्तीय राहत साबित होगी और उन्हें अपना मेहनताना पाने के लिए बैंकों और ई-मित्र केंद्रों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

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