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अराफात के दिन की मुख्य बातें:
- अराफात का दिन हज का केंद्रीय स्तंभ है, जिसके बिना हज अधूरा माना जाता है।
- दुनिया भर से आए लाखों हाजी आज के दिन मैदान-ए-अराफात में ‘वुकूफ’ करते हैं।
- आज के दिन का रोज़ा पिछले और अगले एक-एक साल के गुनाहों का प्रायश्चित है।
- अराफात के मैदान में इमाम का खुतबा और सामूहिक दुआ इस दिन का मुख्य आकर्षण।
- सूर्यास्त के बाद सभी हाजी मुज़दलफ़ा की ओर प्रस्थान करेंगे और रात वहीं बिताएंगे।
हज का सबसे बड़ा मुकाम: अराफात का दिन और इसकी महत्ता
बीकानेर। इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक ‘हज’ आज अपने सबसे अहम मुकाम पर है। ग़ौरतलब है कि हज की मुकम्मिलियत तभी मानी जाती है जब हाजी नौ ज़िलहिज्जा को अराफात के मैदान में मौजूद हो। हदीस-ए-नबवी के अनुसार, “हज तो अराफात ही है।” यानी इस दिन की रूह और इबादत ही पूरे हज का निचोड़ है। आज दोपहर से लेकर सूर्यास्त तक, लाखों लोग एक ही लिबास (इहराम) में खुदा के सामने हाथ फैलाकर अपनी खताओं की माफी मांग रहे हैं।
रहमतों की बारिश: दुआ, इबादत और रोज़े की फ़ज़ीलत
जो लोग इस वर्ष हज की सआदत हासिल नहीं कर पाए हैं, उनके लिए भी आज का दिन बेहद खास है। तफ्तीश और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अराफात के दिन का रोज़ा रखना सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। यह रोज़ा इंसान के दो साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) बनता है। बीकानेर की मस्जिदों और घरों में भी आज विशेष दुआओं का दौर जारी है। सूत्रों के अनुसार, आज के दिन सबसे बेहतरीन दुआ “ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहु ला शरीक लह…” का कसरत से विर्द किया जा रहा है।
अराफात में आज इमाम का खुतबा उम्मत की एकता और इंसानियत के संदेश के साथ गूँज रहा है। सूर्यास्त के बाद हाजी मुज़दलफ़ा की ओर बढ़ेंगे, जहाँ वे रात बिताकर कल सुबह ‘ईदुल अज़हा’ (बकरीद) की तैयारियों में जुट जाएंगे। आज का यह दिन पूरी दुनिया में शांति और भाईचारे की दुआओं के साथ मनाया जा रहा है।
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