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फैसले की मुख्य बातें:
- विशेष पॉक्सो कोर्ट ने सुभाष और धर्माराम को सामूहिक दुष्कर्म का दोषी माना।
- दोषियों को ‘शेष प्राकृतिक जीवनकाल’ (अंतिम सांस) तक जेल की सजा।
- दोनों अभियुक्तों पर 1-1 लाख रुपये का भारी अर्थदंड (जुर्माना) भी लगाया गया।
- नाबालिग पीड़िता के पुनर्वास के लिए 4 लाख रुपये के मुआवजे की अनुशंसा।
- अभियोजन पक्ष ने 15 गवाहों और 23 दस्तावेजी साक्ष्यों के जरिए अपराध किया सिद्ध।
शेष जीवन तक कारावास: दरिंदों को कोई रिहाई नहीं
बीकानेर। जिले के एक बहुचर्चित सामूहिक दुष्कर्म मामले में न्यायपालिका ने न्याय के उच्च आदर्शों को स्थापित करते हुए अपराधियों पर वज्रपात किया है। ग़ौरतलब है कि विशेष पॉक्सो न्यायालय की न्यायाधीश डॉ. मनीषा चौधरी ने सोमवार को अभियुक्त सुभाष और धर्माराम उर्फ धर्मपाल को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376-DA और पॉक्सो एक्ट के तहत गंभीर अपराधी माना। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इन दोषियों को अब अपनी पूरी जिंदगी जेल की चारदीवारी के भीतर ही बितानी होगी, उन्हें किसी भी प्रकार की रिहाई का लाभ नहीं मिलेगा।
गवाहों ने पुख्ता किया अपराध, पीड़िता को मिला संबल
इस संवेदनशील मामले की तफ्तीश और अदालती कार्यवाही के दौरान विशिष्ट लोक अभियोजक शिवचंद भोजक ने मजबूती से पक्ष रखा। अभियोजन पक्ष द्वारा न्यायालय के समक्ष 15 गवाहों के बयान और 23 महत्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्य पेश किए गए। इन पुख्ता सबूतों के आधार पर अदालत ने माना कि सुभाष ने नाबालिग के साथ बलात्कार किया और धर्माराम ने इस घृणित कृत्य में सक्रिय सहयोग दिया। साथ ही, दोषियों को घर में जबरन घुसने (धारा 447) और मारपीट (धारा 323) के लिए भी अलग-अलग कारावास की सजा सुनाई गई है।
सूत्रों के अनुसार, न्यायालय ने पीड़िता के मानसिक आघात और भविष्य के पुनर्वास के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए ‘राजस्थान पीड़ित प्रतिकर योजना-2011’ के तहत 4 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की अनुशंसा की है। न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में कहा कि केवल अपराधियों को दंडित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़िता को न्याय के साथ-साथ समाज में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए उचित संबल प्रदान करना भी अनिवार्य है।
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