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समारोह का मुख्य विवरण:
- स्वतंत्रता सेनानी स्व. सत्यनारायण पारीक के जीवन संघर्ष और सादगी को किया गया याद।
- हैदराबाद से बीकानेर तक का सफर और खादी के प्रति उनकी निष्ठा की हुई चर्चा।
- सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी अविनाश गोयल को शॉल व स्मृति चिन्ह से किया गया सम्मानित।
- वरिष्ठ नागरिकों के लिए मनोरंजन केंद्र के सफल संचालन हेतु मिला गोयल को मान।
- शिक्षा और साक्षरता के क्षेत्र में स्व. पारीक के ऐतिहासिक योगदान पर पड़ा प्रकाश।
स्वतंत्रता की मशाल: एक ऐतिहासिक वृत्तांत
बीकानेर। देश के स्वाधीनता आंदोलन में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले स्व. सत्यनारायण पारीक की स्मृतियाँ आज भी बीकानेर की गलियों में जीवंत हैं। ग़ौरतलब है कि 18 जुलाई 1921 को जन्मे सत्यनारायण जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हैदराबाद में पूरी की और 1939 में बीकानेर लौटकर सीधे स्वतंत्रता आंदोलन की ज्वाला में कूद पड़े। उनके सादगीपूर्ण जीवन और खादी के प्रति समर्पण का विवरण आज भी प्रेरणा देता है; बताया जाता है कि खादी पहनने के कारण सीआईडी के सिपाही लगातार उनकी निगरानी करते थे। आजादी के बाद भी उन्होंने शिक्षा और साक्षरता की अलख जगाना जारी रखा, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 1995 में प्रतिष्ठित ‘नेहरू लिट्रसी अवार्ड’ से नवाजा गया।
अविनाश गोयल का अभिनंदन: समाज सेवा को सम्मान
स्वतंत्रता सेनानी की 105वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित गरिमामय समारोह में इस वर्ष अविनाश गोयल को ‘सत्य-स्मृति सम्मान’ अर्पित किया गया। जेएनवी कॉलोनी स्थित मनोरंजन केंद्र में आयोजित कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने गोयल द्वारा वरिष्ठ नागरिकों के लिए किए जा रहे कार्यों की जमकर सराहना की। चर्चा के दौरान आर.के. शर्मा ने रेखांकित किया कि गोयल ने बुजुर्गों को अकेलेपन से उबारकर उन्हें एक खुशहाल सामाजिक मंच प्रदान किया है। गायत्री परिवार से जुड़े अविनाश गोयल ने इस सम्मान को समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का प्रोत्साहन माना।

समारोह के वृत्तांत के अनुसार, कार्यक्रम में कमल किशोर पारीक, सुमन पारीक, आर.के. वर्मा, एस.के. सोनी और समाज के कई अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। सभी ने स्व. पारीक जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया। यह आयोजन बीकानेर की समृद्ध सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत को मजबूती प्रदान करने वाला सिद्ध हुआ।
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