ख़बर बीकानेर | 25 फ़रवरी 2026

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बीकानेर।
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-1 ने मारपीट और चोट पहुंचाने के चार साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों को दोषी करार दिया है। अदालत ने दोनों को चार साल का कठोर कारावास और 11,000 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है। अर्थदंड जमा न कराने पर एक-एक माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। इस फैसले को पीड़ित पक्ष न्याय की बड़ी जीत के रूप में देख रहा है।
✔ घटना कैसे हुई?

परिवादी माणक भाट ने नयाशहर पुलिस थाने में दर्ज रिपोर्ट में बताया कि घटना 26 मई 2020 की दोपहर की है। वह उस दिन फायरिंग रेंज स्थित एक मंदिर की साफ-सफाई कर रहा था। इसी दौरान मुरलीधर व्यास नगर निवासी मनोहर भाट और दीपक डाकौत सहित कुछ अन्य लोग वहां पहुंचे। परिवादी के अनुसार आरोपी पहले तो गाली-गलौज करने लगे, और जब उन्होंने इसका विरोध किया तो उन्होंने उस पर हमला कर दिया।
हमले में माणक भाट घायल हो गए और उन्हें उपचार करवाना पड़ा। इसके बाद उन्होंने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज करवाया। पुलिस ने जांच के दौरान साक्ष्य जुटाए और मामले को अदालत में पेश किया, जहां से अब फैसला आया है।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने घटना से संबंधित उपलब्ध प्रमाणों और गवाहों के बयान अदालत के समक्ष पेश किए। अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 6 गवाहों के बयान दर्ज करवाए गए, जिनमें परिवादी, चिकित्सा संबंधी साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शी शामिल रहे। इन बयानों ने अदालत को यह मानने में मदद की कि आरोपियों ने वास्तव में परिवादी के साथ मारपीट की थी।
अदालत ने मामले की गंभीरता, घटना के दौरान हुई चोटें और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सबूतों का अध्ययन करने के बाद मनोहर भाट व दीपक डाकौत—दोनों नामजद आरोपियों—को दोषी करार दिया।
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-1 ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों को चार साल का कठोर कारावास सुनाया। साथ ही 11,000 रुपये का अर्थदंड लगाया गया है। आदेश के अनुसार यदि दोनों में से कोई आरोपी यह राशि जमा नहीं करवाता है तो उसे एक महीने का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
परिवादी माणक भाट की ओर से अदालत में पैरवी बजरंग छींपा ने की। उन्होंने अदालत के समक्ष तर्क रखे कि घटना पूर्वनियोजित नहीं थी, लेकिन आरोपियों का व्यवहार हिंसक और उकसाने वाला था। अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई चिकित्सा रिपोर्ट और गवाहों के स्पष्ट बयान इस मामले में निर्णायक साबित हुए।
इस प्रकार के मामले सामाजिक स्तर पर भी कई सवाल खड़े करते हैं। मंदिर या सार्वजनिक स्थानों पर काम कर रहे व्यक्तियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं अक्सर सामने आती हैं, लेकिन कई बार शिकायतें दब जाती हैं। ऐसे मामलों में अदालतों के सख्त फैसले समाज को यह संदेश देते हैं कि कानून सबके लिए बराबर है और हिंसा की घटनाओं को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत का फैसला आने के बाद परिवादी ने संतोष जताया। उन्होंने कहा कि चार साल तक चले इस कानूनी संघर्ष के बाद न्याय प्राप्त हुआ है। उन्होंने पुलिस और अदालत दोनों का धन्यवाद किया तथा उम्मीद जताई कि ऐसे फैसले भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकेंगे।
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